मुझे ये सब अच्छा नहीं लग रहा हैं.”वो मेरे करीब आ मेरे सीने पर साबुन लगाने का प्रयास करने लगा. इस साल हम नए घर पर हैं तो शायद विनय यहाँ बासुकी के साथ होली खेलने की चाहत में आया था. हिंदी XXX मेरा ब्लाउज गीला हो मेरे मम्मो से चिपक गया था और मेरे निप्पल साफ़ नजर आ रहे थे और मेरे मम्मो का उभार पूरी तरह से नजर आ रहा था. मैं एक बार फिर शर्म से पानी पानी हो गयी.वो मझ पर हंसने लगा कि मैं खुद अपने कपड़े खोल रही हूँ.विनय: “अब रहने भी दो, क्यों इतना शरमा रही हो? सिर्फ तिलक लगाने को बोला था.”विनय: “अरे सूखा रंग हैं, कुछ नहीं होगा साड़ी को, धो लेना. पर बासुकी तो खुद उसके घर के उधर ही गया हुआ हैं.मैं सोचने लगी, दरवाजा खोलू या नहीं, कही वो मुझे रंग से ना भर दे, मेरी नयी साड़ी ख़राब हो जाएगी. पक्का रंग नहीं चलेगा.”विनय: “बस थोड़ा सा मुँह पर लगवा लो, जल्दी रंग उतर जाए तो कैसी होली.”मुझे अपनी साडी खतरे में दिखाई दी. रंग तो लगवाना पड़ेगा.”मैं: “होली का मतलब सिर्फ रंग लगान ही तो नहीं, मुँह मीठा करके भी होली मना सकते हैं. साबुन भी लगा ही देते तो पूरी नहा लेती.”मैं भूल ही गयी कि मेरा ब्लाउज सफ़ेद रंग का था और अंदर ब्रा भी नहीं पहना था.















