मैं सीधा सादा लड़का हूँ..मैं मुस्कुरा उठी.. हिंदी XXX मेरे हाथ में सेक्स की किताबें थीं और मर्दों वाले कन्डोम भी थे। मेरा मन चंचल हो उठा.. यानि लड़का-लड़की सचमुच में सेक्स कर रहे थे.. और जिस तरह से उनमें मेरी गोलाइयाँ फंसी हुई थीं.. लेकिन सृजन करके सन्तान का कोई प्रयास नहीं किया.. मैं उसी को अपनाती रही.. लेकिन संप्रदाय और परंपरा के अनुसार पति के घर को अपना संसार और पति की सेवा अपना धरम मानते हुए जीवन जी रही थीं। पिताजी के तीन और भाई थे.. पर उससे ज़्यादा और कुछ नहीं होगा। फिर इस लड़के का क्या दोष? कभी-कभी उनके मन में थोड़ी सी आत्मविश्वास भरी हिम्मत उभरती.. उससे सब कुछ साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था। लेकिन जिसको दिखाना चाहती थी.. उन्हें छूने की इच्छा.. खुद हालत से मजबूर मुझे भी वही नसीयत देती.. अपनी आँखें बन्द करती तो यही दृश्य सामने आ जाता..आँखें खोलती तो फिर से बन्द करके वही सपना देखने की इच्छा होती। मन में शर्म और लाज ने मस्ती और वासना से जंग छेड़ रहे थे। आख़िर बहकता हुए मन ने शर्म और लाज को अपने आपसे मिटा डाला। आख़िर कब तक मैं अपने जिस्म को ऐसी दंड देती रहूंगी। पहली बार जो मेरे और परवेज के अवैध सम्बन्ध बने तो मन ग्लानि से भर उठा था और उसी समय सोच लिया था कि अब आगे















