यह तो बोलती ही नहीं।“क्या कहेगी बेचारी ! चादर को पकड़कर रोक भी नहीं पाई। उसकी आँखें फैल गर्इं।मुझे काटो तो खून नहीं। कोई कुछ नहीं बोला। न छवि, न मेरे नीचे दबा अरुण, न मैं।मनीष ढिठाई से हँसा, “तो यह परेशानी है माधुरी को… इसे तो मैं भी दूर कर सकता था।” वह अरुण की तरह जेंटलमैन नहीं था।‘नहीं, यह परेशानी नहीं है !’ छवि ने आगे बढ़कर टोका।“तो फिर?”“इसके अन्दर केला फँस गया है। देखते नहीं?”अरुण मेरे नीचे दुबका था। मेरे दोनों पाँव सहारे के लिए अरुण की जांघों के दोनों तरफ बिस्तर पर जमे थे। टांगें समेटते ही गिर जाती। मनीष बिना संकोच के कुछ देर वहाँ पर देखा। फिर उसने नजर उठाकर मुझे, फिर माधुरी को देखा।हम दोनों के मुँह पर केला लगा हुआ था। मुझे लग गया कि वह समझ गया है। व्यंग्य भरी हँसी से बोला, “तो केले का भोज चल रहा है!!” उंगली बढ़ाकर उसने मेरे मुँह पर लगे केले को पोछा और मेरी योनि की ओर इशारा करके बोला, “इसमें पककर तो और स्वादिष्ट हो गया होगा?”हममें से कौन भला क्या कहता?“मुझे भी खिलाओ।” वह हमारे हवाइयाँ उड़ते चेहरे का मजा ले रहा था।“नहीं खिलाना चाहते? हिंदी XXX मैं इसे नहीं लूँगा?”“तुमने क्या इसे वेश्या समझ रखा है?” छवि की आवाज अप्रत्याशित रूप से तेज हो जाती है।‘क्यों ?















