परसों पण्डिताइन ने बताया था कि तू आधी रात तक उसे रौन्दता रहा था जब्कि उसी दिन दोपहर में मुझे पूरा निचोड़ चुका था साले तेरा बस चले तो गाँव की सारी जवान बुड्ढी सबको समूचा निगल जाये।”ये सुन कर पण्डित सूर्यप्रकाश ने पूरा जोर लगा के चौधराइन की कमर को थोड़ा कस के दबाया, गोरी चमड़ी लाल हो गई, चौधराइन के मुंह से हल्की सी आह निकल गई, “आआह।” पण्डितजी का हाथ अब तेजी से चौधराइन की कमर पर चल रहा था। तेज चलते हाथों ने चौधराइन को थोड़ी देर के लिये भूला दिया की वो क्या पूछ रही थी।पण्डितजी ने अपने हाथों को अब कमर से थोड़ा नीचे चलाते हुए पेट तक फ़िर नाभि के नीचे तक पेटीकोट के अन्दर तक ले जाने लगे। इस प्रकार करने से चौधराइन की पेटीकोट के अन्दर नाभि के पास खुसी हुइ साड़ी धीरे धीरे बाहर निकल आई और फ़िर धीरे से पण्डितजी ने चौधराइन की कमर की साइड में हाथ डाल कर पेटीकोट के नाड़े को खोल दिया।चौधराइन चिहुंकी, सर घुमा के देखा तो पण्डितजी की धोती में उनका फ़ौलादी लण्ड फ़ुफ़्कार रहा था चौधराइन ने अपना मुंह फ़िर नीचे तकिये पर कर लिया पर धीरे से हाथ बढ़ाकर उनका साढ़े आठ इन्च का फ़ौलादी लण्ड धोती के ऊपर से ही थाम फ़ुसफ़ुसाते हुए बोलीं – “खाल में रहो पण्डित अभी इतना टाइम















