धीरे धीर अशोक ने झटकों की स्पीड बढ़ा दी और लगा चूत का चूरमा बनाने.दीपाली के मुह से आवाज निकल रही थी,” अहह..थो..डा …धीरे….अह्ह्ह..ध्रुव….. तभी अशोक ने वहां पड़ी एक रिवॉल्विंग कुर्सी पे दीपाली को बिठाया और कहा, “दीपाली तुम्हारे हस्बैंड कितने लकी हैं, अगर मैं तुम्हारा पति होता तो दिन रात तुम्हारी साड़ी में ही घुसा रहता.”“तुम्हें क्या पता मेरी साड़ी में क्या है?”“मेरी इन उँगलियों ने देख लिया है की क्या है तुम्हारी साड़ी में और वो ये बता रही हैं कि साड़ी में जो छेद है वो उँगलियों से खेलने कि नहीं है.”“तो फिर किस चीज़ से खेलने कि है?”अशोक ने अपनी जीभ की टिप निकली और कहा,”-इस से.”ये कह कर अशोक, दीपाली की पेंटी निकालने लगा.अशोक ने दीपाली को थोडा सा कुर्सी पर और लिटाया ताकि उसके चूतड़ थोड़े से बाहर निकल आयें और दीपाली की साड़ी को ऊपर उठा दिया. हिंदी XXX दीपाली ने अपनी पीली पैंटी से अपनी गांड साफ़ करने लगी और फिर धीरे धीरे अपनी जांघें और टाँगे साफ़ की.फिर अपनी पैंटी को मेज़ पे रख के अपने कपडे पहनने लगी.अशोक ने कहा,” तुमने तो साफ़ कर लिया, मेरा क्या होगा?”दीपाली बोली,” तुम भी मेरी ही पैंटी से साफ़ कर लो “और कह कर हँसने लगी.















