मेरी उत्सुकता बढ़ती ही जा रही थी। मैं देखना चाहता था की उन दोनों की जवानी क्या रंग लाती है।ऐसे ही दिन बितते चले गए। धर्मेन्द्र को सरिता को फाँसने का मौक़ा नहीं मिल रहा था। माँ के रहने से सरिता को खिसक ने का मौक़ा मिल जाता था, और धर्मेन्द्र हाथ पे हाथ धरे वापस चला जाता था।कुछ दिनों के बाद एक दिन हमारी कॉलोनी के दूसरे छोर पर सुबह कॉलोनी की सारी महिलाओं ने मिलकर एक घर में सत्संग का कार्यक्रम रखा था। माँ सुबह तैयार हो कर मुझे घर का ध्यान रखने की हिदायत दे कर सत्संग में जाने के लिए निकली।मैं अपनी पढ़ाई में लगा हुआ था की सरिता आयी और बर्तन मांजने बैठ गयी। बर्तन करने के बाद जब रसोई में झाड़ू लगा रही थी तब तो धर्मेन्द्र प्रसाद पाइप लेकर घरमें दाखिल हुआ। उसे पता लग गया की घर में मेरे और सरिता के अलावा कोई नहीं था।धर्मेन्द्र ने मुझे देखा तो इशारा कर के मुझे सरिता के बारेमें पूछने लगा। मैंने धर्मेन्द्र को रसोई की और इशारा किया। धर्मेन्द्र समझ गया की सरिता रसोई में है। धर्मेन्द्र ने मुझे अपने नाक और होंठों पर उंगली रखकर चुप रहने का इशारा किया। मैं समझ गया की उस दिन कुछ न कुछ तो होने वाला था। “Sex Ka Khula Aamantran”बस फिर क्या था?















