अचानक मेरे दिमाग में एक तरकीब आई। मैंने कक्षा में सबको कह दिया कि जिसको लैक्चर समझ में नहीं आया वो मेरे घर पर आकर समझ सकता है।यह बात कहने के साथ साथ मैं उसे देख भी रहा था। वर्षा बहुत खुश हुई। उसे खुश देखकर मैं भी खुश था कि शायद वो घर पर आ ही जाए। कक्षा खर्म करने के बाद मैं लाईब्रेरी में जाकर बैठ गया। उस वक्त लाईब्रेरी में मेरे सिवा सिर्फ़ एक लाईब्रेरियन था जो दूसरे सैक्शन में बैठा किताबें सैट कर रहा था। तभी वर्षा लाईब्रेरी में आई, वो शायद मुझे ही ढ़ूंढ़ रही थी।वो मेरे पास आकर बोली- सर, मैं और मेरी सहेली मानसी आपके घर पर आकर आपके साथ कुछ टॉपिक्स डिस्कस करना चाहती हैं।मैं- ठीक है। पर अच्छा होगा कि तुम अकेली ही आओ क्योंकि मेरे पास एक ही कम्प्यूटर है। अगर तुम अकेले आओगी तो तुम्हें अच्छे से समझा दूँगा।ऐसा कहते कहते मैंने उसके नितम्बों पर हाथ फ़ेर दिया। उसका चेहरा एकदम लाल हो गया और उसने हाँ में सिर हिलाया और चलने लगी। अभी वो दरवाजे पर ही थी कि मैंने उसे आवाज लगाई- वर्षा !वर्षा- जी?मैं- कल भी स्कर्ट पहन कर आना।और वो शरमा कर भाग गई। अगले दिन एक बजे तक सब नौकर अपना-अपना काम निबटाकर चले गए। मैंने भी दुबारा से नहा-धो कर लोअर और टी-शर्ट पहन ली।















