ये क्या कर रहा हूँ। तुझे तो रंग खेलना जरा भी पसंद नही था” माँ कहने लगी.मैंने फिर से लम्बी पिचकारी में रंग भरा और माँ के पेट पर मारने लगा। इस बार उनका गोरा गोरा पेट फिर से रंग गया। फिर माँ अंदर वाले कमरे में भाग गयी।“आज आपको नही छोडूंगा” मैंने कहा और दौड़ा लिया.फिर हाथ में रंग लेकर उनके गोरे गोरे गाल पर मल दिया। वो भी शरारत करने लगी। वो भी मुझे गालो पर और पूरे चेहरे पर रंग लगा दी। मैंने उसी वक्त कमरे में उनको पकड़ लिया और होठो पर किस करने लगा। माँ कुछ समझ नही पायी। उनकी साड़ी, ब्लाउस पूरी तरह से रंग वाले पानी से भीगी हुई थी। मैं भी भीगा हुआ था। मैंने उसको सीने से चिपका लिया और खूब किस किया।“ये सब क्या है जुबिन बेटा??” वो मुस्कुराकर पूछने लगी.“आज होली के दिन आपकी चूत में रंग भरकर होली खेलूँगा। बाहर बाहर के मर्द आपको चोदे और मुझे ही आपकी बुर चोदने को न मिले, ये तो बड़ी गलत बात है। पर आज से आप सिर्फ मेरा और दादा जी का लौड़ा ही खाओगी। किसी बाहर वाले का लंड अपनी बुर में नही खाओगी” मैंने कहा.“बेटा!!















