उनके स्कूल की पढ़ाई कैसे चल रही है, कोई दिक्कत तो नही आ रही?”, मैंने पूछ। “वो भी एकदम बढ़िया है, आजकल उन्हें टूशन्स भेज रहा हु तो पढ़ाई की कोई चिंता नही रही अब।” “फिरदौस मुमानी कैसी है, कई दिनों से उनसे बात नही हुई, उनके पैरों का दर्द ठीक हुआ या नहीं?”, मैंने कहा।“नहीं भांजे, इसीलिए तो तुझसे मैं फ़ोन पर बात करना चाहता था, अब तू तो जनता है, तेरी फिरदौस मुमानी तो दिन भर बैच्चों के पीछे और घर के कामो में कितनी भाग दौड़ करती रहती है, और मैं भी दिन भर काम पर चला जाता हूं, शाम को आकर थके हारे सो जाता हूं.अगर तुझे वक़्त हो तो तू यह कुछ दिनों के लिए आजा और फिरदौस को अपने साथ अस्पताल ले जा, आखिर तू अपने लाडली मुमानी के लिए इतना तो कर ही सकता है, उम्मीद करता हु की तू कोई बहाना नही देगा।”, मामू मुझसे कहने लगे।“ठीक है मामू परसो सुबह की ट्रेन पकड़कर मैं दोपहर तक घर पर आ जाऊँगा आप फिक्र मत करो। चलो अब फोन रखता है ध्यान रखिये, परसो मुलाकात होगी, खुदा हाफिज।”, और फोन काँट दिया। वैसे तो मुझे मामू के घर जाने बहुत बोर होता था, वहां मनोरंजन का कोई साधन भी नही था, उनके बच्चे भी कुछ काम के नही थे और वहा के मेरे सारे दोस्त















