प्रीति के रूप को मैं निहारता रह गया. प्रीति के रूप को मैं निहारता रह गया. XXX Hindi मैंने खुद प्रीति की गुलाबी कुरती को उतार दिया. कभी उसे दर्द होता कभी नही, पर नए नए चूदाई का सुख तो मेरी प्रीति उठा रही थी.उसकी नाजनीन पलकें कभी गिरती, कभी उठती, कभी उसकी भौहे फैलती, कभी सिकुड़ती. प्रीति चिहुक उठती थी. मैं ८ वी में पढ़ रहा था, पर चुदाई और मैथुन क्या होता है, ये मैं जान गया था. मैं उसके दोनों दूध पीने में डूबा था.इसके साथ ही दूसरे खाली दूध को हाथ में लेकर होर्न की तरह दबा देता था. एक बार तो लगा की मैं उसके साथ गोवा या कोई पर्यटन स्थल पर आया हूँ और हनीमून मना रहा हूँ.उसकी बगलों में बड़ी बारीक़ हल्के हल्के बाल थे. छरहरा इकहरा बदन आज कल की छोकरियों के बिलकुल विपरीत जो फास्ट फ़ूड खा खाके मोटी और भद्दी हो जाती है. मेरे सामने उसका नया नया यौवन से परिपूर्ण बदन खुला हुआ था.प्रीति के चेहरे पर नूर ही नूर झलक रहा था, उसकी मासूमियत की खूबसूरती. मेरे हाथ लगातार उसके चुच्चों पर लगातार गश्त लगा रहें थे जैसी पुलिस रात में पुरे शहर में गश्त लगाती. बिलकुल देसी मछली थी.















