कसूर मेरा नहीं था, कसूर उनका भी नहीं था। दोष यह भाग्य का था जिसने उस रात मेरी आँख उस समय पे खोली जब मेरी बाजी करवट बदल के लेटी थी।और मैंने उनकी गाण्ड को सलवार के ऊपर से देख लिया था। यहीं से तो शुरू हुई थी ये बहकी, खाँमोश प्रेम कहानी। में बाजी के पेट को चूमे जा रहा था और उन्होंने मदहोशी की स्थिति में ही अपना एक हाथ जो मेरे हाथ को पकड़े हुए था उसे मेरे शोल्डर पे रखा और मुझे जोर लगा के पीछे करने लगीं।पर जितना वे मुझे पीछे की ओर जोर लगा रही थीं उससे ज़्यादा जोर लगा के मैं उनके पेट पे अपने होंठ जमाए उन्हें चूमे जा रहा था। यह एहसास ही मेरी दीवानगी में और इज़ाफा किए जा रहा था कि मेरे होंठ मेरा प्यार के, मेरी रानी के, मेरे सपनों की रानी के, मेरी बाजी के नरम गोरे पेट को चूम रहे हैं।बाजी ने कहा: रिजवान बस। रिजवान नहीं। मत करो ऐसे।मैंने मदहोशी के से आलम में ही डूबे हुए और होंठ पेट पे जमाए हुए ही अपनी नज़रें ऊपर बाजी के चेहरे की ओर कीं, उनकी आंखें बंद थी और चेहरे पे बहुत तकलीफ आसार नज़र आ रहे थे। जहां वह अपने पेट पे मेरे होंठों के स्पर्श से मदहोश हो रही थीं, शायद वहीं वो इस बात से















