मैंने अपनी बेशर्मी के लिए खुद को डाँटा। ये कहानी आप हमारी वासना डॉट नेट पर पढ़ रहे है.“अब मुझे सीधे प्याले से ही खाने दो।”छवि हट गई। मनीष उसकी जगह आ गया। मैंने न जाने कौन सेी हिम्मत जुटा ली थी। जब सब कुछ हो ही गया था तो अब लजाने के लिए क्या बाकी रहा था। मैंने उसे अपने मन की करने दिया। अंतिम छोटा-सा ही टुकड़ा अन्दर बचा था। अंतिम कौर।“मेरे लिए भी रहने देना।” मेरे नीचे से अरुण ने आवाज लगाई। अब तक उसमें हिम्मत आ गई थी।“तुम कैसे खाओगे? हिंदी XXX तुम तो फँसे हुए हो।” मनीष ने कहकहा लगाया, “फँसे नहीं, धँसे हुए…..”छवि ने बड़े अभिभावक की तरह हस्तक्षेप किया, “मनीष, तुम अरुण की जगह लो। अरुण को फ्री करो।”क्या ????हैरानी से मेरा मुँह इतना बड़ा खुल गया। छवि यह क्या कर रही है?मनीष ने झुककर मेरे खुले मुँह पर चुंबन लगाया, “अब शोर मत करो।”उसने जल्दी से बेल्ट की बकल खोली, पैंट उतारी। चड़ढी सामने बुरी तरह उभरी तनी हुई थी। उभरी जगह पर गीला दाग।वह मेरे देखने को देखता हुआ मुसकुराया, “अच्छी तरह देख लो।” उसने चड्डी नीचे सरका दी। “यह रहा, कैसा है?”इस बार डर और आश्चर्य से मेरा मुँह खुला रह गया।वह बिस्तर पर चढ़ गया और मेरे खुले मुँह के सामने ले आया,”लो, चखो।”मैंने मुँह घुमाना चाहा पर उसने पकड़ लिया,”मैंने तुम्हारा वाला















