तुम मर्दो की तो बस ये पुरानी आदत होती है औरतों की तारीफे करना” मैंने कहा.तभी निखिल ने गाड़ी रोकी और बाहर निकलने लगे। दोनों पास में ही खड़े होकर अपना अपना औजार निकाल कर पेशाब करने लगे। मेरी तरफ उन दोनों का पिछवाड़ा था। मेरे को उनके लंड का दर्शन ही नहीं करने को मिल पा रहा था।दोनो आपस में पता नहीं क्या बात कर रहे थे। दोनों ने अपना लंड अंदर किया और गाडी में आकर बैठ गए। अब ड्राइविंग अनुभव कर रहा था। निखिल आगे बैठने के बजाय पीछे की शीट पर मेरे बगल में आ गया।“यार सुरभि तुम अकेले ही बैठी ही अच्छा नहीं लग रहा था। बात करने में कोई तकलीफ ना ही इसीलिए मैं पीछे ही आ गया” निखिल ने कहा.इतना कहकर उसने मेरा हाथ पकड़ा। मैंने भी कोई विरोध नहीं किया।“क्या बात है तुम्हारे तो विचार कुछ बदलते हुए नजर आ रहे है” मैंने कहा.“तेरे को देखकर किसी का भी विचार बदल सकता है। वैसे भी किसी के साथ कुछ कर लेने से कुछ चला थोड़ी न जाता है” निखिल ने कहा.“तुम कहना क्या चाह रहे हो” मैंने बहुत ही प्यार से पूछा.“बस इतना की कोई औरत किसी भी मर्द को एक बार अपनी गुप्तांग से खेलने का मौका दे देती है तो उसमें क्या हर्ज है!















