मुझे यह सब नहीं करना। हाय। मैं मरी। “उफ कातिल कातिल छोड़ो। मेरी फदी गई शायद। हाय। तुही करना है या नहीं मुझे तो अपना पानी निकालना है।हाय मेरी जान ले हजारो रूपये की नौकरी के लिए तु ये भी नहीं झेल सकती क्या।और इसी प्रकार लगभग पक्कों की रफ्तार और तेज कर दी। हिमांशी को चुत में बिजली सी महसुस होन लगी थी। उसके लण्ड सटकने की इच्छा होने लगी थी। अब वह चुत को फाड़ कर जायजा लेने लगी। आहिस्ता-आहिस्ता उसके छटपटाने तथा घबराहट मस्ती में बदल गई।वह कोली भरने पर पुनः मजबूर हो गई। उसने गांड़ उछाल कर बुदबाना प्रारम्भ कर दिया। हर धक्के में अब वह जन्नत के लुफ्त लुट रही थी। जुदाई का सक्चा ज्ञान क्षण प्रतिक्षण उसे होता जा रहा था। बेहद मजे को लुटती हुई वह सिसकारी भरने लगी। आह सर। आप थीक कहते। मारो। पुरा दर्द गायब होता जा रहा है। उफ मारो। वाह- ये फर्क कैसे हो गया। शीशी ई। क्या इसलिए रखा था मुझे वाह।रानी रोज दिया करोगी न। बराबर चुत का सत्यानाश करते हुए सत्यम ने हिमांशी के दिल चुदाई चाहत के भाव ताड़ने के ख्याल से पुछा तो वह बोली करों ये नौकरी मुझे बहुत पसन्द है और करो। मैं उड़ी सी जा रही हुँ हाय हाय मुझे सम्भालों। हाय मैं गिरने हो रही हूं। सत्यम जी समझ गए कि















